Election Campaign
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NDA 2024 नूंह(सुरेन्द्र दुआ) 2024 का लोकसभा चुनाव को लेकर नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई हैं। सूबे में 25 मई को होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर 29 अपै्रल से 6 मई तक नामांकन प्रक्रिया शुरू होने जा रही है लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने अभी तक सूबे की 10 सीटों में से एक भी प्रत्याशी को मैदान में नहीं उतारा हैं। सियासी जानकारों की माने तो कांग्रेस आज उस दौर से गुजर रही हैं जिस दौर से शायद ही भारत में कोई पार्टी शीर्ष पर जाकर गुजरी हो। हालात यह है कि 1991 के बाद केवल 2009 के लोकसभा चुनाव में ही यह पार्टी 200 सीटों का आंकड़ा छू पाई, इस बार भी उसे इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए किसी चमत्कार की ही उम्मीद करनी होगी। निर्वाचन आयोग के आंकडे बताते हैं कि 1951-52 में पहले लोकसभा चुनाव में लोकप्रियता के शिखर पर सवार कांग्रेस को 364 सीट मिली थी। पार्टी को कुल 44.99 फीसदी वोट मिले थे, तीसरे लोकसभा के लिए 1962 में हुए चुनाव में कांग्रेस का वोट फीसदी भी घटा और सीटे भी, वोट 44.71 फीसदी रह गया, जबकि सीटे 361 पर आ गई। 1967 में पार्टी की लोकप्रियता में और गिरावट आई और वोट घटकर 40.78 फीसदी और सीटे 283 तक रह गई। हांलाकि, 1971 में फिर से वापिसी की उसका वोट बढक़र 43.68 फीसदी और सीटें 352 हो गई। इसमें सबसे ज्यादा योगदान आन्ध्रप्रदेश की 28, बिहार की 39, महाराष्ट्र की 42 और उत्तरप्रदेश की 73 सीटों का था। आपातकाल यानि 1977 का दौर पार्टी के लिए बहुत बुरा दौर था, जब उसे पहली बार केन्द्र से सत्ता से हाथ धोना पड़ा। देश में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने आपात काल लगाया हुआ था, लोकसभा का कार्यकाल नवंबर में खत्म होने वाला था लेकिन अचानक 18 जनवरी को चुनाव की घोषणा कर दी, आपातकाल से नाराज जनता एकजुट हुई और कांग्रेस को केवल 154 सीटों पर समेट दिया। वोट फीसदी भी 34 फीसदी आ गया। 26 वर्षो में कांग्रेस के लिए यह सबसे बुरा चुनाव था, उधर जनता पार्टी को 295 सीटे मिली और उसने सरकार बना ली। आपातकाल के दौरान सूबे के सर्वाधिक पिछडे जिला नूंह(मेवात) पूर्व में जिला गुडगांव का हिस्सा तावडू व सोहना में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत मोरारजी देसाई 19 माह तावडू में नजरबंद रहे थे और जनता पार्टी की सरकार बनने पर देश में उनका पहला दौरा भी तावडू में रहा था। इसी तरह, जयप्रकाश नारायण, कर्पुरी ठाकुर, राजनारायण, देवीलाल व देश के उच्च कोटी के अन्य राजनेता भी सोहना-तावडू में आपातकाल के दौरान नजर बंद रहने की बात किसी से छिपी हुई नही हैं। हांलाकि, जनता पार्टी की सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा नही कर पाई और 1980 में मध्यवर्ती चुनाव कराये गये, इस चुनाव में कांग्रेस को 42.69 फीसदी वोट के साथ 353 सीटे मिली। 1984 में पार्टी इस आंकडे को भी पार कर गई। दरअसल प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की उनके ही सुरक्षा गार्डों ने हत्या कर दी और इससे उनके प्रति जबरदस्त साहनुभूति की लहर उठी, साहनुभूमि की लहर में कांग्रेस का वोट बढकर 48 फीसदी को भी पार कर गया, सीटे भी रिकार्ड 414 हो गई। यह वह रिकार्ड हैं जो आज तक कांग्रेस न दोहरा पाई और ना ही पिछले 10 वर्षों में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची सत्ताधारी भाजपा इसके करीब पहुंची। भाजपा को 2014 में 282 सीटे, 2019 के चुनाव में 303 सीटें मिली। 2024 के चुनाव में भाजपा ने 400 के पार का नारा दिया है। लोकसभा में बहुमत के लिए 272 सीटों की जरूरत होती हैं। आंकडे बताते है कि 1984 के बाद कांग्रेस को कभी भी अकेले बहुमत नही मिला, 1989 में उसे 39.53 फीसदी वोट और 197 सीटें मिली। 1991 में उदारीकरण के दौर में पार्टी को 36.40 फीसदी वोट और 244 सीटे हांसिल कर पाई। उस समय पहली बार भाजपा को 120 सीटे मिली थी और उसका वोट 20 फीसदी से ज्यादा था। कांग्रेस की स्थिति लगातार खराब होती गई, जब तक 2004 का चुनाव नहीं हुआ। 1996 में कांग्रेस को 140, भाजपा को 161 सीटे मिली, 1998 में पार्टी को 141 व भाजपा को 184 सीटे मिली। 1999 में भाजपा ने 182 सीटे जीतकर एनडीए की सरकार बनाई, कांग्रेस इस बार भी 114 सीटों पर सिमट गई। उसका वोट भी 28.30 फीसदी तक रह गया। हांलाकि, विपक्ष एनडीए को घेरने के लिए इंडिया महागठबंधन बनाकर भाजपा का 2024 का विजय रथ रोकने के लिए हर संभव प्रयास भी किये जा रहे हैं लेकिन अभी तक सूबे की 10 में से 1 भी सीट पर पार्टी द्वारा किसी भी प्रत्याशी को मैदान में न उतारने से पार्टी के नेताओ, वर्करों आदि की असमंजस की स्थिति बनी हुई हैं। खासकर गुरूग्राम लोकसभा से भाजपा प्रत्याशी राव इन्द्रजीत सिंह के चौका मारने के दावे को धराशाही करने की बात फिल्हाल यहां बेमानी दिखाई दे रही हैं।

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Anjana Kashyap

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