Election Campaign
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लोहारू:(Election Campaign) लोकसभा चुनाव के चलते विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता जहां चुनाव प्रचार में जुटे हुए है वहीं समय के साथ आए बदलाव के कारण उनके पारंपरिक परिधान में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां कार्यकर्ताओं की पहचान धोती कुर्ता व सिर पर खंडवे के रूप में होती थी तथा उन्हें ही चौधरी व नेता के रूप में जाना जाता था, लेकिन समय बदला, पहनावा बदला, हालत यह हो गई कि अब चुनाव प्रचार के लिए गांव गांव में घर घर तक जाने वाले कार्यकर्ताओं व नेताओं में कोई फर्क नहीं रह गया है। आम आदमी की तरह ही वे आधुनिक पहनावे में जनसंपर्क में जुटे है।

सांस्कृतिक मंचों तक सीमित होकर रह गए हरियाणवी परिधान Election Campaign

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण दिन प्रतिदिन सामाजिक ढांचे व रहन-सहन के साथ पहनावे में आए बदलाव से न केवल युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को भूलती जा रही है बल्कि पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव समाज के बुजुर्गों पर भी देखा जा सकता है। समाज में ऑनर किलिंग व अन्तर्जातीय विवाह का अंदर खाते विरोध कर सामाजिक व प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने व युवा पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाले खाप पंचायतों के सदस्य व समाज में मौजिज लोग का दर्जा रखने वाले बुजुर्ग भी इस संस्कृति की चपेट में है। चुनावों में समय अक्सर नेताओं की वेशभूषा में नजर आने वाले कार्यकर्ता भी इससे अछूता नहीं है।
समाज में चौधर व आन बान शान की प्रतीक मानी जाने वाली पगड़ी जिसे देसी भाषा में खंडवा के नाम से जाना जाता है, तथा सामाजिक परंपरा के अनुसार इसे वे लोग धारण करते है जो समाज में प्रतिष्ठित व गणमान्य व पंचायती व्यक्ति माना जाता है। वर्तमान में खाप पंचायते व अन्य संगठन सामाजिक मूल्यों व मर्यादा की रक्षा के लिए समय-समय पर दंभ भरते नहीं थकते, लेकिन एक कटु सच्चाई यह भी है कि उन लोगों के सिर से आज खंडवा गायब है, इसके पीछे कारण चाहे कुछ भी हो, लेकिन इतना अवश्य है कि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते आन बान व शान का प्रतीक खंडवा भी अपनी पहचान खोता जा रहा है तथा वर्तमान स्थिति पर गौर किया जाए तो खंडवा बुजूर्गो के सिर से लुप्त ही हो गया है या फिर यूं कहा जाए कि चौधर का प्रतीक खंडवा अब सिर के ऊपर बोझ बन गया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।

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Anjana Kashyap

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