Solution to economic problems according to Pandit Pradeep Mishra
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श्री शनि देव की आरती, जो उनकी प्रशंसा और कृपा का प्रतीक है, निम्नलिखित है:

जय जय श्री शनिदेव प्रभु
करत सदा अपने भक्त ब्रज में
तन को अति चढ़त अपना प्रकोप
काहे को नहीं सुनत गुरु सुनावत कोप॥

ज्ञान प्रकाश कियो सभ संसार
करै कालस्वरूप उजागर
भक्ति मार्ग प्रदक जीवन को
पाप मिटावत दुख हरत कठिन को॥

श्री शनिदेव दीन दयालु
कियो कृपा तोर अति हितकारी
शनि दोष मिटावत नित भक्तन का
ज्ञान भक्ति प्रकाश करै चारी॥

अर्धांग शनि के तन गुण धाम
ज्ञानियों के हृदय निकट नाम
जय श्री शनिदेव भगवान की
प्रेम सहित कोई नाम धरी॥

इस आरती का पाठ शनि देव की प्रशंसा और उनकी कृपा के लिए किया जाता है। यह आरती शनि देव के भक्तों द्वारा नियमित रूप से गाई जाती है और उनकी कृपा के लिए प्रार्थना की जाती है।
शनि देव की प्रशंसा और उनकी कृपा के विषय में बात करते समय, उन्हें विलक्षणता, दया, और समर्पण की गुणवत्ता से संबंधित माना जाता है। शनि देव हिन्दू धर्म में नवग्रहों में से एक हैं और उन्हें संदिग्ध और कठिनाईयों का प्रतीक माना जाता है।
शनि देव की प्रशंसा उनके उत्कृष्ट धार्मिक गुणों, साधना के प्रति आदर और उनके साधकों के प्रति दया के लिए की जाती है। वे संवेदनशील, उदार, और न्यायप्रिय माने जाते हैं। शनि देव की कृपा का प्राप्ति के लिए भक्तों को संवेदनशीलता, संयम, और कर्मठता की आवश्यकता होती है। उनकी कृपा से मनुष्य के कष्टों को दूर किया जा सकता है और उन्हें अच्छा भविष्य और सफलता प्राप्त हो सकती है। उनकी प्रशंसा और उनके आशीर्वाद का प्राप्ति सभी को भगवान की शरण में आने और उनकी शिक्षाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

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Anjana Kashyap

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